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Monday, January 23, 2012

Netaji

माँ भारती के यशस्वी पुत्र नेताजी सुभाष चन्द्र बोस( २३जन,१८९७- १६ सितम्बर'१९८५) को शत-१ नमन! आज़ादी की लड़ाई का वो महानायक जिसका स्वर्णिम अध्याय इतिहास के पन्नो में कही खो गया. हे माँ भारती तू ऐसे क्रांतिकारी पुत्रों को बार-२ इस धरती पे जन्म दे. नेताजी सुभाष अमर रहे! जय माँ भारती!
अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन पर आइए करें उन्हें नमन।
खूनी हस्‍ताक्षर!
वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन, न रवानी है!
जो परवश होकर बहता है,
वह खून नहीं, पानी है!
उस दिन लोगों ने सही-सही
खून की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में
मॉंगी उनसे कुरबानी थी।
बोले, "स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुम्हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके जग में,
लेकिन आगे मरना होगा।
आज़ादी के चरणें में जो,
जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूँथी जाएगी।
आजादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है"
यूँ कहते-कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया!
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा
दमकी उनकी रक्तिम काया!
आजानु-बाहु ऊँची करके,
वे बोले, "रक्त मुझे देना।
इसके बदले भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना।"
हो गई सभा में उथल-पुथल,
सीने में दिल न समाते थे।
स्वर इनकलाब के नारों के
कोसों तक छाए जाते थे।
“हम देंगे-देंगे खून”
शब्द बस यही सुनाई देते थे।
रण में जाने को युवक खड़े
तैयार दिखाई देते थे।
बोले सुभाष, "इस तरह नहीं,
बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं
आकर हस्ताक्षर करता है?
इसको भरनेवाले जन को
सर्वस्व-समर्पण काना है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीव न
माता को अर्पण करना है।
पर यह साधारण पत्र नहीं,
आज़ादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का
कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!
वह आगे आए जिसके तनमें
खून भारतीय बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को
हिंदुस्तानी कहताहो!
वह आगे आए, जो इस पर
खूनी हस्ताक्षर करता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए
जो इसको हँसकर लेता हो!"
सारी जनता हुंकार उठी-
हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो,
हम अपना रक्त चढाते हैं!
साहस से बढ़े युबक उस दिन,
देखा, बढ़ते ही आतेथे!
चाकू-छुरी कटारियों से,
वे अपना रक्त गिराते थे!
फिर उस रक्त की स्याही में,
वे अपनी कलम डुबाते थे!
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे!
उस दिन तारों ने देखा था
हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिक्खा महा रणवीरों ने
ख़ूँ से अपना इतिहास नया।
--गोपालप्रसाद व्यास

Saturday, January 21, 2012

1945 में एक विमान दुर्घटना में नेता जी को मृत घोषित किया गया. 1947 को हुए अनुबंध में फिर ये शर्त क्यों रखी गई की नेता जी भारत आते हैं तो उन्हें अंग्रेजी हुकूमत को सौंपना होगा.....इसका आशय यही हैं की अंग्रेज भी जानते थे की नेता जी जीवित हैं और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु जी भी जानते थे की सुभाष जिन्दा हैं.....फिर ये विमान दुर्घटना का झूठ क्यों...???
कहते हो बैठे थे सुभाष जिस विमान में
हो गया हैं ध्वस्त वो विमान ताइवान में
सूर्य के समक्ष वक्ष तान घटा छा गई
भाग्य की कलम स्याही से कहर ढा गई
दिव्य क्रांति-ज्योत को अँधेरा आके छल गया
बोलते हो सूर्य-पुत्र चिंगारी से जल गया
आपसे वो जली हुई लाश मांगता हैं देश
एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश
--------------- --------राष्ट्र वादी कवि सौरभ सुमन जैन जी------------- --------------- ---------