Monday, April 27, 2020

मंदी कैसे आती है

*मंदी कैसे आती है*

एक छोटे से शहर मे एक बहुत ही मश्हूर बनवारी लाल समोसे बेचने वाला था, वो ठेला लगाकर रोज दिन में 500 समोसे खट्टी मीठी चटनी के साथ बेचता था रोज नया तेल इस्तमाल करता था और कभी अगर समोसे बच जाते तो उनको कुत्तो को खिला देता 

बासी समोसे या चटनी का प्रयोग बिलकुल नहीं करता था, उसकी चटनी भी ग्राहकों को बहुत पसंद थी जिससे समोसों का स्वाद और बढ़ जाता था 

कुल मिलाकर उसकी क्वालिटी और सर्विस बहोत ही बढ़िया थी

*उसका लड़का अभी अभी शहर से अपनी MBA की पढाई पूरी करके आया था, एक दिन लड़का बोला पापा मैंने न्यूज़ में सुना है मंदी आने वाली है, हमे अपने लिए कुछ cost cutting करके कुछ पैसे बचने चाहिए, उस पैसे को हम मंदी के समय इस्तेमाल करेंगे*

समोसे वाला : बेटा में अनपढ़ आदमी हूँ, मुझे ये cost cutting wost cutting नहीं आता, न मुझसे ये सब होगा, बेटा तुझे पढ़ाया लिखाया है अब ये सब तू ही सम्भाल

बेटा : ठीक है पिताजी आप रोज रोज ये जो फ्रेश तेल इस्तमाल करते हो इसको हम 80% फ्रेश और 20% पिछले दिन का जला हुआ तेल इस्तेमाल करेंगे

अगले दिन समोसों का टेस्ट हल्का सा चेंज था पर फिर भी उसके 500 समोसे बिक गए और शाम को बेटा बोलता है देखा पापा हमने आज 20%तेल के पैसे बचा लिए और बोला पापा इसे कहते है COST CUTTING

समोसे वाला : बेटा मुझ अनपढ़ से ये सब नहीं होता ये तो सब तेरे पढाई लिखाई का कमाल है

लड़का : पापा वो सब तो ठीक है पर *अभी और पैसे बचाने चाहिए, कल से हम खट्टी चटनी नहीं देंगे और जले तैल की मात्र 30% प्रयोग में लेंगे*

अगले दिन उसके 400 समोसे बिक गए और स्वाद बदल जाने के कारण 100 समोसे नहीं बिके जो उसने जानवरो और कुत्तो को खिला दिए

*लड़का: देखा पापा मैंने बोला था न मंदी आने वाली है, आज सिर्फ 400 समोसे ही  बिके हैं*

समोसे वाला : बेटा अब तुझे पढ़ाने लिखाने का कुछ फायदा मुझे होना ही चाहिए। अब आगे भी मंदी के दौर से तू ही बचा

लड़का : पापा कल से हम मीठी चटनी भी नहीं देंगे और जले तेल की मात्रा हम 40% इस्तेमाल करेंगे और समोसे भी कल से 400 हीे बनाएंगे

अगले दिन उसके 400 समोसे बिक गए पर सभी ग्राहकों को समोसे का स्वाद कुछ अजीब सा लगा और चटनी न मिलने की वजह से स्वाद और बिगड़ा हुआ लगा

शाम को लड़का अपने पिता से : देखा पाप आज हमे 40% तेल, चटनी और 100 समोसे के पैसे बचा लिए, पापा इसे कहते है cost कटाई और कल से जले तेल की मात्रा 50% कर दो और साथ में tissue पेपर देना भी बंद कर दो

अगले दिन समोसों का स्वाद कुछ और बदल गया और उसके 300 समोसे ही बिके

*शाम को लड़का पिता से : पापा बोला था न आपको कि मंदी आने वाली है*

समोसे वाला : हाँ बेटा तू सही कहता है मंदी आ गई है, अब तू आगे देख क्या करना है, कैसे इस मंदी से लड़ें ?

लड़का : पापा एक काम करते हैं, कल 200 समोसे ही बनाएंगे और जो आज 100 समोसे बचे है कल उन्ही को दोबारा तल कर मिलाकर बेचेंगे

अगले दिन समोसों का स्वाद और बिगड़ गया, कुछ ग्राहकों ने समोसे खाते वक़्त बनवारी लाल को बोला भी और कुछ चुप चाप खाकर चले गए। आज उसके 100 समोसे ही बिके और 100 बच गए।

शाम को लड़का बनवारी लाल से : पापा, देखा मैंने बोला था आपको कि अभी और ज्यादा मंदी आएगी, अब देखो कितनी मंदी आ गई है

समोसे वाला : हाँ बेटा तू सही बोलता है, तू पढ़ा लिखा है समझदार है, अब आगे कैसे करेगा ?

लड़का : पापा कल हम आज के बचे हुए 100 समोसे दोबारा तल कर बेचेंगे और नए समोसे नहीं बनाएंगे

अगले दिन उसके 50 समोसे ही बीके और 50 बच गए ... ग्राहकों को समोसा का स्वाद बेहद ही ख़राब लगा और मन ही मन सोचने लगे बनवारी लाल आजकल कितने बेकार समोसे बनाने लगा है और चटनी भी नहीं देता कल से किसी और दुकान पर जाएंगे

शाम को लड़का : पापा, देखा मंदी ? आज हमने 50 समोसों के पैसे बचा लिए। अब कल फिर से 50 बचे हुए समोसे दोबारा तल कर गरम करके बचेंगे

अगले दिन उसकी दुकान पर शाम तक एक भी ग्राहक नहीं आया और बेटा बोला देखा पापा मैंने बोला था आपको और मंदी आएगी और देखो आज एक भी ग्राहक नहीं आया और हमने आज भी 50 समोसे के पैसा बचा लिए। इसे कहते है Cost Cutting.

बनवारी लाल समोसे वाला : बेटा खुदा का शुक्र है तू पढ़ लिख लिया वरना इस मंदी का मुझ अनपढ़ को क्या पता की cost cutting क्या होता है .... *और अब एक बात और सुन*

बेटा : क्या.....????

समोसे वाला : कल से चुपचाप बर्तन धोने बैठ जाना यहाँ पर .... ये सारी मंदी तेरी खुद की लाई हुई है, अब से मंदी को मैं खुद देख लूंगा।
😂😂😂😂😂
साभार : फेसबुक मीडिया।

इसके आगे मैं बताता हूँ, बेटे ने ज्यादा पैसा इसलिए नहीं लगाया क्योंकि वो अब समोसे बनाना नही चाहता था, वो MBA करके आया था, वो अब बड़ा रेस्टोरेंट खोलना चाह रहा है। इसलिए उसने मार्किट में से सारा पैसा खींच लिया।
शेयर बाजार में भी ऐसे ही मंदी लाई जाती है। जब शेयरों की कीमत बढ़ जाती है तो बड़े खिलाड़ी शेयरों को बेच देते हैं, बाजार में भगदड़ मच जाती है, सभी बेचने लगते हैं। बाजार नीचे आ जाता है। शेयरों की कीमत कम हो जाती है। तो बड़े खिलाड़ी फिर से कम कीमत पर शेयर खरीद लेते है। और लाभ कमाते हैं।

तो साथियों मंदी कभी खुद नहीं आती बल्कि लाई जाती है।


Tuesday, April 21, 2020

अंधेर नगरी चौपट राजा...

अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके शेर खाजा।।

काशी-तीर्थयात्रा की वापसी में एक गुरु और शिष्य किसी  नगरी में पहुँचे। नाम उसका अंधेर नगरी था। शिष्य बाजार में सौदा खरीदने निकला तो वहाँ हर चीज एक ही भाव-‘सब धान बाइस पसेरी।’

भाजी टका सेर और खाजा (एक मिठाई) भी टका सेर। शिष्य और चीजें खरीदने के झंझट में क्यों पड़ता ? एक टके का सेर भर खाजा खरीद लाया और बहुत खुश होकर अपने गुरु से बोला, ‘‘गुरुजी, यहाँ तो बड़ा मजा है। खूब सस्ती हैं, चीजें, सब टका सेर। देखिए, एक टका में यह सेर भर खाजा लाया हूँ। हम तो अब कुछ दिन यहीं मौज करेंगे। छोड़िए तीर्थयात्रा, यह सुख और कहाँ मिलेगा ?’’

गुरु समझदार थे, बोले, ‘‘बच्चा, इसका नाम ही अंधेर नगरी है। यहाँ रहना अच्छा नहीं, जल्दी भाग निकलना चाहिए यहाँ से। वैसे भी, साधु का एक ठिकाने पर जमना अच्छा नहीं। कहा है, ‘साधु रमता भला, पानी बहता भला।’’

पर शिष्य को गुरु की बात नहीं भाई। बोला, ‘‘अपने राम तो यहाँ कुछ दिन जरूर रहेंगे।’’

गुरु को शिष्य को अकेले छोड़ जाना उचित नहीं लगा। बोले, ‘अच्छा, रहो और कुछ दिन। जो होगा, भुगता जाएगा।’’

अब तक शिष्य अंधेर नगरी का सस्ता माल खा-खाकर खूब मोटा हो गया। उन्हीं दिनों एक खूनी को फाँसी की सजा हुई थी। पर वह अपराधी बहुत दुबला-पतला था। फाँसी का फंदा उसके गले में ढीला था। इस समस्या से निजात पाने के लिए राजा ने कहा कि जिसकी गरदन मोटी हो, उसे ही फाँसी लगा दो। अंधेर नगरी ही जो ठहरी। हाकिम ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि जो मोटा आदमी सामने मिल जाए, उसी को फाँसी लगा दो। एक खून के बदले में किसी एक को फाँसी होनी चाहिए। इसकी हो या उसकी, किसी की भी हो-"खून का बदला खून"

सिपाही मोटा व्यक्ति खोजने चले तो वही मोटा शिष्य सामने पड़ा। वह हलवाई के यहाँ खाजा खरीद रहा था। सिपाही उसे ही पकड़कर ले चले। गुरु को खबर लगी, वह दौड़े आए। सब बातें लोगों से मालूम कीं। एक बार तो उनके मन में आया कि इसे अपनी बेवकूफी का फल भोगने दें, पर गुरु का हृदय बड़ा दयालु था। सोचा, जीता रहेगा तो आगे समझ जाएगा। सिपाहियों के पास जाकर बोले,
 ‘‘इस वक्त फाँसी चढ़ने का हक तो मेरा है, इसका नहीं।’’
‘‘क्यों ?’’

‘‘इस वक्त कुछ घंटों के मुहूर्त में फाँसी चढ़कर मरनेवाला सीधा स्वर्ग जाएगा। शास्त्र में गुरु के पहले शिष्य को स्वर्ग जाने का अधिकार नहीं है।’’

शिष्य गुरु की चाल समझ गया चिल्ला उठा, ‘‘नहीं गुरुजी, मैं ही जाऊँगा। सिपाहियों ने मुझे पकड़ा है। आपको पकड़ा होता तो आप जाते।’’
इसी एक बात पर दोनों ने परस्पर झगड़ना शुरू कर दिया। सिपाही हैरान थे। भीड़ इकट्ठी हो गई। फाँसी चढ़ने के लिए झगड़ना-वहाँ के लोगों के लिए यह एकदम नई बात थी।

जल्दी ही यह बात राजा के कानों तक पहुँची। राजा ने कहा, ‘‘यदि ऐसा मुहूर्त है तो सबसे पहला अधिकार तो राजा का ही होता है और उसके बाद क्रम उसके उच्चाधिकारियों का।’’

गुरु-शिष्य बहुत चिल्लाए कि साधु के रहते स्वर्ग में जाने का अधिकार किसी दूसरे को कदापि नहीं है; पर किसी ने एक न सुनी। सबसे पहले राजा और फिर एक-एक करके कई मंत्री अधिकारी फाँसी पर चढ़ गए। गुरु ने सोचा कि अब ज्यादा मनुष्य-हत्या नहीं होनी चाहिए, तो अफसोस करते हुए बोले-‘‘अब तो स्वर्ग जाने का मुहूर्त समाप्त हो गया।’’ इसके बाद फिर कोई फाँसी न चढ़ा।

तभी गुरु ने शिष्य के कान में कहा, ‘‘अब यहाँ से जल्दी से निकल भागना चाहिए। देख लिया न तुमने कि अंधेर नगरी में कैसे-कैसे बेवकूफ बसते हैं ?


Sunday, November 24, 2019

दहेज की बारात - काका हाथरसी (बृज भाषा में)

जा दिन एक बरात कौ, मिल्यौ निमंत्रण-पत्र,
 फूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्र।
 यत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटी, 
बा दिन अच्छी नाहिं लगी, अपने घर रोटी। 
कहँ ‘काका’ कविराय, लार म्हौंड़ेसों टपके,
कर लड़ुअन की याद, जीभ स्याँपिन सी लपकै। 

मारग में जब है गई अपनी मोटर फेल, 
दौरे स्टेशन, लई तीन बजे की रेल। 
तीन बजे की रेल, मच रही धक्कमधक्का, 
द्वै मोटे गिर परे, पिच गए पतरे कक्का। 
कहँ ‘काका’ कविराय, पटक दूल्हा ने खाई, 
पंडितजू रह गए, चढ़िगयौ ननुआ नाई। 
नीचे कों करि थूथरौ, ऊपर कों करि पीठ, 
मुरगा बनि बैठे हमहुँ, मिली न कोऊ सीट। 
मिली न कोऊ सीट, भीर में बनिगौ भुरता, 
फारि लै गयौ कोउ हमारौ आधौ कुरता। 
कहँ ‘काका’ कविराय, परिस्थिति बिकट हमारी, 
पंडितजी रहि गए, उन्हीं पै ‘टिकस’ हमारी। 

फक्क-फक्क गाड़ी चलै, धक्क-धक्क जिय होय, 
एक पन्हैया रहि गई, एक गई कहुँ खोय। 
एक गई कहुँ खोय, तबहिं घुसि आयौ टी-टी, 
माँगन लाग्यौ टिकस, रेल ने मारी सीटी। 
कहँ ‘काका’, समझायौ पर नहिं मान्यौ भैया, 
छीन लै गयौ, तेरह आना तीन रुपैया। 

जनमासे में मचि रह्यो ठंडाई कौ सोर, 
मिर्च और सक्कर दइऔ सपरेटा में घोर। 
सपरेटा में घोर, बराती करते हुल्लड़, 
स्वाद-स्वाद में खेंचि गए हम बारह कुल्हड़। 
कहँ ‘काका’ कविराय, पेट है गयौ नगाड़ौ, 
निकरौसी के समय हमें चढि़आयौ जाड़ौ। 

बेटावारे ने कही, यही हमारी टेक, 
दरबज्जे पै लै लऊँ, नगद पाँच सौ एक। 
नगद पाँच सौ एक, परेंगी तब ही भाँवर, 
दूल्हा करिदौ बंद, दई भीतर सौं साँकर। 
कहँ ‘काका’ कवि, समधी डोलें रूसे-रूसे, 
अर्धरात्रि है गई, पेट में कूदें मूसे। 

बेटीवारे ने बहुत जोरे उनके हाथ, 
पर बेटा के बाप ने सुनी न कोऊ बात। 
सुनी न कोऊ बात, बराती डोलें भूखे, 
पूरी-लडुआ छोड़, चना हू मिले न सूखे। 
कहँ ‘काका’ कविराय, जान आफत में आई, 
जम की भैन बरात, कहावत ठीक बनाई। 

समधी-समधी लडि़ परे तै न भई कछु बात, 
चले घरात-बरात में थप्पड़-घूँसा-लात। 
थप्पड़-घूँसा-लात, तमासौ देखें नारी, 
देख जंग कौ दृश्य, कँपकँपी बँधी हमारी। 
कहँ ‘काका’ कवि, बाँध बिस्तरा भाजे घर कों, 
पीछे सब चल दिए, संग में लैकें वर कों। 

मार भातई पै परी, बनिगौ वाको भात, 
बिना बहू के गाम कों, आई लौट बरात। 
आई लौट बरात, परि गयौ फंदा भारी, 
दरबज्जे पै खड़ीं, बरातिन की घरवारी। 
कहँ काकी ललकार, लौटकें वापिस जाऔ, 
बिना बहू के घर में कोऊ घुसन न पाऔ। 

हाथ जोरि माँगी क्षमा, नीची करकें मोंछ, 
काकी ने पुचकारिकें, आँसू दीने पोंछ। 
आँसू दीने पोंछ, कसम बाबा की खाई, 
जब तक जीऊँ, बरात न जाऊँ रामदुहाई। 
कहँ ‘काका’ कविराय, अरे ओ बेटावारे, 
अब तौ दै दै, टी-टी वारे दाम हमारे। 

Thursday, September 19, 2019

होमवर्क📚 - जब अध्यापक का सामना गरीबी के सच से होता है

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गूडमॉर्निंग सर!
गूडमॉर्निंग बच्चों! बैठिये!
थैंक यू सर!
आप सब को कल होमवर्क दिया था ..किया?
यस सर!
किसने किसने होमवर्क किया?हाथ ऊपर??
गुड!!जिन बच्चों ने होमवर्क नही किया वो बच्चे खड़े हो जाएँ??

कक्षा में सभी बच्चे विद्यालय मानक के अनुसार होनहार नही होते.. हर एक बच्चा अपनी अपनी  क्षमता अनुसार अलग होता है। किसी के पढ़ने लिखने की क्षमता अच्छी होती है तो किसी की कम..वो थोड़े अलग बच्चे होते हैं..

दूर दराज बसे गाँव के सरकारी स्कूल की इस कक्षा में भी एक ऐसी ही बच्ची थी,जो अलग थी। 

"ख़ुशी" नाम था उसका।

बच्चे होमवर्क नहीं करते तो कैसी कहानियां बनाते हैं.. बचपन तो याद होगा।
पेट दर्द, कॉपी नहीं थी, कल स्कूल नही आये थे, सर भूल गए थे, सर किया हूँ कॉपी घर छूट गयी..

...पर वो बिलकुल चुप थी! उसके चेहरे पर एक शिकन भी नहीं, उसे शायद डाँट या शायद मार खाने का डर भी नहीं था। मैली यूनिफॉर्म पहने सांवले रँग की वो लड़की अजीब तरह से मुझे देखती रही.. एक अजीब तरह की चुनौती थी उसके देखने में।

होमवर्क क्यों नहीं किया?
चुप!
बताओ वरना आज तो पक्का सजा मिलेगी!!
चुप!
बोल क्यों नही रही???
चुप!

अब मेरा सब्र खो रहा था। आवाज़ की तल्खी बढ़ रही थी। इतने में उसकी सहेली ने बताना शुरू किया..
"सर! ख़ुशी का हाथ जल गया था।।"

नज़र पड़ी, हाथ पर छोटा फफोला था..

अंदर का अध्यापक दबने लगा... इस बार मेरी आवाज़ में नरमी थी... फिर पूछा

हाथ कैसे जला ख़ुशी..?

अब चुप हो जाने की बारी मेरी थी। ख़ुशी ने बताना शुरू किया:-
सर समय ही नही मिला!मम्मी होटल पर काम करती हैं न!मैं अपने 3 साल के भाई को सम्भाल रही थी। कल रात बहुत देर से घर आई थी। रात को भी खाना मैं ही बनाई। सवेरे भी खाना बना के आ रही हूँ। छौकां ऊपर छटक गया तो हाथ जल गया।

मैं किस "होमवर्क" की बात कर रहा था.. ? असली "होमवर्क" तो आउट ऑफ़ सिलेबस था, उसके भी...
....मेरे भी।

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Yasho Dev Rai
( देवयशो ) 

आलोक:-
( यदि आप सोचते हैं की सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई नही होती गई तो आपने अपने देश को अच्छे से जाना ही नहीं, ऐसे विद्यालयों के द्वार खुले हैं उस उपेक्षित समाज के बच्चों के लिए भी जो अपने जीने की भी लड़ाई लड़ रहे हैं।
हमें उन सब का सम्मान करना चाहिए जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रयासरत हैं, चाहे वो सुविधाविहीन बच्चे हों, फीस भर पाने में असमर्थ अभिभावक हों या फिर एक अशिक्षा से अनदेखी लड़ाई लड़ रहा शिक्षक.. जय हिन्द!)

Sunday, July 7, 2019

क्रांतिकारी की चप्पल




वो अलस्सुबह दस बजे उठता है। मुँह-हाथ धोता है, जिसे वो नहाना हीसमझता है। केतली-भर चाय बना बिस्तर पर बैठता है। पहले अखबार पढ़ता है। फिर दर्शन का रुख करता है। गुरजेफ से लेकर जिब्रान तक सब पढ़ता है। वो पढ़ता जाता है और उसका तापमान बढ़ता जाता है। 

दोपहर होते-होते भुजाएँ फड़कने लगी हैं। भेजे के कुकर में विचारों की बिरयानी हद से ज्यादा उबल चुकी है, रग-रग में सीटियाँ बज उठी हैं। उसे उलटी करनी है। लेकिन कहाँ जाए? ढक्कन कैसे खोले ? दोस्त तो सभी नौकरियों (जो उसकी नजर में छोटी) पर गए हैं।

 हताशा में वो टीवी चलाता है। खबरिया चैनल पर रुकता है। जहाँ ‘आजादी से हासिल’ पर चर्चा हो रही है। इसे खुराक मिल गई। लेकिन दो मिनट में तीनों विचारक खारिज। ये सब किताबी बातें हैं, इनमें से कोई जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं। वो गुस्से में 7388 पर एसएमएस करता है। सोचता है, एंकर अभी मैसेज पढ़ कहेगा—वाह! क्या कसीली बात लिखी है। वो इंतजार कर रहा है, बिना जाने कि ये रिपीट टेलिकास्ट है! 

इस बीच बहस बिजली समस्या की तरफ मुड़ती है। वो सीधा होता है, वॉल्यूम बढ़ाता है...सत्यानाश...तभी बिजली चली जाती है। लानत है...हासिल की बात करते हैं, ‘ये’ हासिल है...बिजली की समस्या पर चर्चा सुनने लगो तो बिजली चली जाती है! 

ईश्वर, तू ही बता, आखिर क्या कसूर था मेरा? तेंदूखेड़ा की बजाय मैं टोरंटो में क्यों नहीं जन्मा? बर्गर की जगह भिंडी क्यों लिखी मेरी किस्मत में? लेकिन तभी उसे ‘रंग दे बसंती’ का डायलॉग याद आता है—सिस्टम से समस्या है तो शिकायत मत करो, उसे बदलने की कोशिश करो। वो खड़ा होता है...सोचता है...बहुत हुआ...मैं जा रहा हूँ अज्ञानता का अंधकार मिटाने, ज्ञान के दीप जलाने, होम का मोह छोड़, दुनिया के लिए खुद को होम करने।

लेकिन, ये क्या...कहाँ हो तुम...यहीं तो थी...कहाँ चली गई...यहाँ-वहाँ हर जगह ढूँढ़ा...नहीं मिल रही...खयाल आया...कहीं छोटा भाई तो नहीं पहन गया...हाँ, वही पहन गया होगा...उसे तो मैं... 

देखते-ही-देखते माहौल और मूड बदलने लगा है। देश को बदल देने की ‘महत्त्वाकांक्षा’, भाई को देख लेने की ‘आकांक्षा’ में तबदील हो गई है। क्रांतिकारी का भाई, जो जरा नीचे दही लेने गया है, नहीं जानता कि उसने देश की उम्मीदों की दही कर दी। नाउम्मीद हुआ क्रांतिकारी फिर से बिस्तर पर जा लेटा है। तापमान गिरने लगा है, जोश भाप बन उड़ चुका है। और इस मुल्क की तकदीर ‘एक बार फिर’ इसलिए नहीं बदल पाई क्योंकि क्रांतिकारी को उसकी चप्पल नहीं मिली! 

HUM SAB FAKE HAIN
BY NIRAJ BADHWAR
(FROM KINDLE)