Thursday, December 15, 2011

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है |
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है |
माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है |
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलतीपोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आनेवालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है |
लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन न आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।

Friday, December 9, 2011

जंगल को बना कर सूखे का ढेर अब वो माचिस बनाने वालों से कह रहे हैं
अपनी हदों में रहो, आग लगने का डरहैं
ैकल तक इन्ही माचिसों से जला कर आग तुमने भी बहुत हाँथ सेके हैं
और आज कह रहे हैं, देख कर यहाँ हमारा भी घर है
हम तो हर बार जले तुम्हारी लगाईं आग में, मौका तुम्हारा पहला है
अब शायद समझ सकोगे हमारे दिल का दर्द, जब दिल तुम्हारा दहला है
माहौल सूखे का है, हवाएं भी गर्म हैं, चिंगारी कहीं से भी लग सकती है
माचिस की तीली मिले न मिले, ये जंगल की आग है कभी भी भड़क सकती है
हम भुझाना भी चाहें तो हमारे बस में नहीं
तुम्हारी लगाईं आग के धुएं ने हमारी आँखों का पानी तक सुखा दिया
पर हो सके तो माफ़ करना ये हमवतनो
सच्चाई बयाँ करतेकरते भावनाओं मेंआकर गर दिल तुम्हारा दुखा दिया
वक़्त अभी भी है संभल जाओ ये आग का खेल बुरा है सबके लिए
वर्ना जंगल तो जलकर ही पनपा है कभी बदलाव तो कभी हक के लिए
हो सके तो कभी सोचना कि आखिर ये माहौल बना ही क्यूँ ???
हमने आतंकी पाले, जेलो मे परसी विरयानी
हर सैनिक कि विधवा रोई, आखों मे आया पानी
बीस खून करके भी वे सब छमादान पा जाते हैं
और शहीदों कि कुरवानी पर बादल छा जाते हैं!
उठो नया कानून मांग लो संसद कि दिवारो से
हत्यारो को छमादान अव नही मिले दरबारो से
इन को सीधा फाँसी टांगे वीर शहीदोंकि माएँ
या सिने पर गोलि मारे बस सैनिक कि विधवाये