Friday, January 8, 2016

फ्री बेसिक्स "A Big Fraud"

फ्री बेसिक्स के पिंजड़े में फ्री डाटा की मूंगफली।
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बंदरो को पकड़ने के लिए शिकारी पिंजड़े में मूंगफलियां रख देते है तथा सलाखों के बीच गेप इतना ही रखा जाता है कि बन्दर का खाली हाथ तो पिंजड़े के भीतर जा सके किन्तु मुट्ठी बाहर न आ सके। बन्दर अपना हाथ सलाखों के अंदर डाल कर पिंजड़े में रखी मूंगफली मुट्ठी में पकड़ लेता है, और उसका हाथ पिंजड़े में फंस जाता है। यदि बन्दर मूंगफली का लालच छोड़ दे तो मुट्ठी खुल जायेगी और वह आजाद हो जाएगा। लेकिन हर बार बन्दर मूंगफली को पकडे रहना ही चुनता है, और शिकारी द्वारा पकड़ा जाता है !!  
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कई फेसबुक यूजर आजकल 'SEND EMAIL' का ऑप्शन क्लिक करके फेसबुक की महत्त्वाकांक्षी योजना 'फ्री बेसिक्स' को भारत में लागू करवाने में सहयोग कर रहे है। यूजर द्वारा 'SEND EMAIL' क्लिक करने से ट्राई (TRAI) के पास यह मेल जाता है कि ईमेल भेजने वाला फ्री-बेसिक्स का समर्थन करता है। साथ ही ईमेल भेजने वाले की मित्र सूची के सभी मित्रो को भी यह नोटिफिकेशन जाता है कि अमुक यूजर ने "भारत में नेट न्युट्रिलिटी को बनाये रखने के लिए फ्री बेसिक्स के समर्थन में मेसेज भेजा है, अत: आप भी भेजे"।
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चूंकि फ्री-बेसिक्स फेसबुक को बेहद मुनाफ़ा और भारत के नागरिको को भारी घाटा देने वाली योजना है, अत: मेल में अन्य विवरण और यूजर का नाम भरकर फॉर्मेट प्रस्तुत करने का काम फेसबुक खुद कर दे रहा है, और यूजर को मेल भेजने के लिए सिर्फ एक क्लिक करना होता है।
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मुझे नहीं पता कि ऐसा क्लिक करने वाले यूजर्स में से कितने व्यक्ति यह जानते है कि उन्होंने असल में भारत में नेट न्युट्रिलिटी को ख़त्म करने के लिए ट्राई को  ईमेल भेज दिया है, या कितनो ने ईमेल के कंटेंट को पढ़ा है या कितने फ्री-बेसिक्स की नीति से वाकिफ है। लेकिन कई गंभीर कार्यकर्ताओ द्वारा भी भेजे गए ईमेल के नोटिफिकेशन प्राप्त होना अप्रत्याशित है। 
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क्या है फ्री-बेसिक्स ?
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यदि चर्च आदिवासी इलाको में अपने केम्प लगाकर खाना और कम्बल वितरित करे तो क्या आप उसे ऐसा करने देंगे !! आप क्यों नहीं करने देंगे, जबकि साफ़ है कि पादरी गरीबो को फ्री में खाना खिला रहा है ? आप ऐसा नही करने देंगे,  क्योंकि आप जानते है कि यह फ्री नही है और पादरी धर्मांतरण के लिए मुफ्त में खाना और कम्बल परोस रहा है। सभी जानते है कि दुनिया में 'फ्री' कुछ नही होता। फ्री बेसिक्स भी फ्री नही है, बल्कि आगे जाकर बहुत महंगी पड़ने वाली है। 
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फेसबुक यह मिथ्या प्रचार कर रहा है कि फ्री-बेसिक्स भारत में नेट न्युट्रलिटी को बनाये रखने के लिए है, जबकि सच्चाई यह है कि फ्री-बेसिक्स नेट न्युट्रिलिटी को ख़त्म कर देगा। फ्री-बेसिक्स में बेसिक्स क्या है इसका फैसला फेसबुक करेगा, अत: जिस सामग्री या वेबसाइट को फेसबुक 'बेसिक्स' की श्रेणी में नहीं रखेगा, यूजर्स उन्हें देखने से वंचित हो जाएंगे। 
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फ्री-बेसिक्स के अन्तर्गत फेसबुक भारत के नागरिको को बेहद कम कीमत में या लगभग मुफ्त सेलफोन डिवाइस बांटने की स्कीम लांच कर सकेगा, या लगभग सभी को 2G, 3G का वायरलाइन कनेक्शन 'फ्री' दिया जाएगा। इस फोन से यूजर्स कॉल तो कर सकेंगे, किन्तु इस फोन या इस कनेक्शन पर 'सिर्फ' उन वेबसाइटों को ही देखा सकेगा जो फ्री-बेसिक्स से जुडी हुई हो, मतलब जिनका फेसबुक से एग्रीमेंट हो। यानी जो कम्पनिया फेसबुक, टेल्को या अन्य किसी टेलीकॉम कंपनी को पैसा दे रही है, उन्ही को उपभोक्ता इंटरनेट पर एक्सेस कर सकेंगे। इस तरह एक विदेशी कम्पनी यह तय करेगी कि क्या बेसिक है, और यह भी कि, इंटरनेट पर आप क्या देखेंगे।
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तो अगर फेसबुक जनता को फ्री इंटरनेट दे रहा है तो समस्या क्या है ?

समस्या यह है कि यदि फेसबुक फ्लिप कार्ट को फ्री बेसिक्स योजना से बाहर करता है किन्तु अमेजन को शामिल कर लेता है तो इस फ्री इंटरनेट पर उपभोक्ता सिर्फ अमेजन की वेबसाइट ही खोल सकेंगे। अत: ऑनलाइन बिजनेस पर अमेजन का एकाधिकार हो जाएगा और अन्य सभी कंपनियां घटते ग्राहकों की संख्या के कारण बंद हो जायेगी। एक बार एकाधिकार होने के बाद अमेजन ग्राहकों से मनमाने दाम वसूल सकेगी और ई-कॉमर्स में प्रतिस्पर्धा के कारण मिल रहे डिस्काउंट के दिन हवा हो जाएंगे। फेसबुक द्वारा दिए गए फ्री इंटरनेट के कारण यूजर्स किसी नई वेबसाइट को देखने के लिए अलग से रिचार्ज नही करवाएंगे।   इसीलिए फ्री-बेसिक्स को वे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनिया फाइनेंस कर रही है जो स्थानीय कम्पनियो को बाजार से बाहर करना चाहती है। हमेशा के लिए।
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इससे सब से ज्यादा विस्तार फेसबुक को मिलेगा, क्योंकि फेसबुक यूज़रबेस कंपनी है और भारत में उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं है। किन्तु फेसबुक को वित्तीय की जगह राजनैतिक फायदा अधिक होगा, जो कि भारी वित्तीय मुनाफा कमाने के मार्ग खोल देगा।
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जहां तक मौद्रिक लाभ कमाने की बात है, सबसे अधिक मुनाफा फ्लिपकार्ट और अमेजन कमाएगी। लेकिन जल्दी ही अमेरिकी कम्पनिया फ्लिपकार्ट को टेक ओवर कर लेगी अत: भारत के पूरे ई-रिटेल बाजार पर अमेरिकी कम्पनियो का एकाधिकार हो जाएगा।
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इस तिकड़म का नाम जुकेरबर्ग ने फ्री-बेसिक्स रख छोड़ा है, और वे दिन दहाड़े यह एलान चला रहे है कि फ्री-बेसिक्स नेट न्युट्रिलिटी को कायम रखेगा। बल्कि वे तो यह भी कह रहे है कि इससे भारत में नेट न्युट्रिलिटी आ जायेगी। और भारत में नेट न्युट्रिलिटी लागू करने की जुकेरबर्ग को इतनी चिंता है कि वे दिन रात भारत के नागरिको को समझा रहे है कि भारत में नेट न्युट्रिलिटी स्थापित करने के लिए ट्राई को ईमेल करो। यहां तक की उन्होंने ईमेल भेजने का सॉफ्टवेयर भी बना दिया है और सभी फेसबुक यूजर्स की वाल पर ट्राई को मेसेज भेजने की अपील भी भेज रहे है !!! इस लिहाज से तो, नेट न्युट्रिलिटी को बचाने के लिए इन्हे भारत रत्न मिल जाना चाहिए !
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कुछ मिथ्या प्रचार की चपेट में आकर और कुछ सोनिया-मोदी-केजरीवाल की अंधभक्ति के वशीभूत होकर यूजर्स ट्राई को ईमेल भी भेज रहे है कि फ्री-बेसिक्स को लागू किया जाए। ज्ञातव्य है कि सोनिया घांडी, मोदी साहेब और केजरीवाल जी फ्री-बेसिक्स का समर्थन कर रहे है, अत: इनके अंध भगत भी देश हित की उपेक्षा करते हुए सोशल मिडिया पर फ्री-बेसिक्स के समर्थन में अभियान चला रहे है।
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मुफ्त इंटरनेट बांटने के लिए विदेशी कंपनी को अनुमति देने के बाद शायद सोनिया-मोदी और केजरीवाल भारत को शिक्षित बनाने के लिए 'एजुकेट इण्डिया' नाम से एक नया अभियान प्रारम्भ करेंगे जिसमे मिशनरीज के पादरियों को बड़े पैमाने पर स्कूल खोलने और भारतीयों को मुफ्त शिक्षा देने के लिए आमंत्रित किया जाएगा !!
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समाधान ???
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हम बीएसएनएल चेयरमेन से मांग कर रहे है कि भारत के सभी 100 करोड़ नागरिको को बीएसएनएल की तरफ से एक मोबाईल फोन, महीने का एक जीबी डाटा, एक सिम, महीने का 50 रू बेलेंस और 100 एसएमएस "फ्री" दिया जाए।
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ये जायज मांग है क्योंकि ----

१) इंटरनेट अब हर व्यक्ति के लिए आवश्यकता बन चुका है, और डिजिटल इण्डिया तभी सफल होगा जब भारत के प्रत्येक नागरिक की पहुँच इंटरनेट तक होगी। ये पहुंच फेसबुक द्वारा नही बल्कि भारत सरकार द्वारा बनायी जानी चाहिए।
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२) 2000 रू प्रति मोबाइल की दर से 100 करोड़ मोबाइल के लिए सिर्फ 2 लाख करोड़ रूपये की आवश्यकता है, जबकि हाल ही में मोदी साहेब कॉर्पोरेट जगत का 2 लाख करोड़ का टैक्स माफ़ कर चुके है। उतने में तो सभी 100 करोड़ नागरिको को मोबाइल की सुविधा मिल जायेगी। 
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३) सभी नागरिको को एक सिम दी जायेगी जिसका नंबर उसकी मतदाता संख्या के आधार पर रजिस्टर्ड किया जाएगा।
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४) 100 एसएमएस होने से नागरिक अपने सांसदों को गैजेट में प्रकाशित करने के लिए आवश्यक कानूनो के आदेश अपने रजिस्टर्ड मोबाइल से एसएमएस द्वारा भेज सकेंगे।
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५) हर महीने 100 करोड़ जीबी डेटा की जरुरत होगी, जो कोई समस्या की बात नहीं है। हमारे ही टैक्स से इसरो ने उपग्रह बनाकर ऊपर भेज के रखे है। अत: इस डेटा पर प्रथम अधिकार भारत के नागरिको का है। ये डेटा ए राजा और सोनिया घांडी ने घूस खाकर औने पौने दामो में बेच दिया, और हम अब टेलीकॉम कम्पनियो को इस डेटा के लिए ऊँचे दाम चुका रहे है।  
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ये मांग भारत के करोडो नागरिको के हित में है, पर क्योंकि इससे टेलीकॉम कंपनियों को घाटा होगा, इसलिए बीएसएनएल चेयरमेन इस मांग को मान नही रहा, और मोदी साहेब भी इस मांग का विरोध कर रहे है। भारत के नागरिको के पास यदि बीएसएनएल चेयरमेन को नौकरी से निकालने का अधिकार हो तो इस मांग को लागू कराया जा सकता है।
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भारत में नेट न्युट्रिलिटी को बचाये रखने के लिए आप क्या कर सकते है ?
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(1) ट्राई को वो ईमेल न भेजे जिसे भेजने की अपील फेसबुक बार बार कर रहा है।
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(2) नेट न्युट्रिलिटी को बनाये रखने के लिए अपने सांसद को यह एसएमएस भेजे---https://web.facebook.com/pawan.jury/posts/820005808117657
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(3) अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे की टीसीपी* क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।

टीसीपी के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/809753852476186

टीसीपी क़ानून के गैजेट में प्रकाशित होने से नागरिको की सहमति से राईट टू रिकॉल बीएसएनएल अध्यक्ष के क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जा सकेगा। यदि बीएसएनएल अध्यक्ष को नौकरी से निकालने का अधिकार नागरिको को मिल जाता है, तो बीएसएनएल अध्यक्ष देश के सभी नागरिको को एक मोबाइल फोन और हर महीने 1 जीबी डाटा उपलब्ध करवाएगा, वरना हम नागरिक राईट टू रिकॉल क़ानून का प्रयोग करके उसे नौकरी से निकाल देंगे।
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*टीसीपी क़ानून के लिए अपना समर्थन आप http://www.bhilwarasms.in/ पर एसएमएस भेज कर दर्ज करवा सकते है।  
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**नागरिको से आग्रह है कि, सोनिया-मोदी-केजरीवाल के अंध भक्तो के भुलावे में आकर ट्राई को ईमेल न भेजे, बल्कि अपने सांसद को ऊपर दिए गए आदेश भेजे, ताकि देश में नेट न्युट्रिलिटी कायम रह सके।

Via Whatsapp.

Sunday, December 20, 2015

नया साल किसने बनाया और कैसे ?

1 जनवरी नव वर्ष न ही वैज्ञानिक है न ही सनातन धर्मियों को शोभनीय।

हिन्दू सनातन धर्मियों के नव वर्ष को अप्रैल फूल से प्रचारित करने वाले इन ईसाईयों के येशु के खतने की दिवस है 1 जनवरी ।

क्या आप येशु के खतने के दिन को नव वर्ष का शुभारम्भ मानते हो ?

क्या आप हिन्दू पंचांग के नव वर्ष को अप्रैल फूल मानते हो ?

जानिये असली इतिहास

वंदेमातरम् ।

नया साल किसने बनाया और कैसे ? http://bharatsamachaar.blogspot.com/2014/12/blog-post_30.html

नए साल का सच

पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..

ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन ..

जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए ..

सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है .. ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और
बारहवाँ महीना है .. हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है .. इसी से september तथा October बना ..

नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के "नव" को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में "Dec" बन जाता है जिससे
December बन गया ..

ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। इसका एक प्रमाण और है ..

जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है????
इसका उत्तर ये है की "X" रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया ..

इन सब बातों से ये निष्कर्ष निकलता है
की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था ..

साल को 365 के बजाय 305 दिन
का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है ..

लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू..

भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था।

इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़
अपना तारीख या दिन 12 बजे
रात से बदल देते है .. दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ??

तुक बनता है भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है.. यानि की करीब 5-5.30 के आस-पास और
इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है।

चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे ..

इसलिए उन लोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ..

जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं, हमारा अनुसरण करते हैं,
और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का, अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं..

कितनी बड़ी विडम्बना है ये .. मैं ये नहीं कहूँगा कि आप आज 31 दिसंबर को रात के 12 बजने का बेशब्री से इंतजार ना करिए या 12 बजे नए साल की खुशी में दारू मत पीजिए या खस्सी-मुर्गा मत काटिए। मैं बस ये कहूँगा कि देखिए खुद को आप, पहचानिए अपने आपको ..

हम भारतीय गुरु हैं, सम्राट हैं किसी का अनुसरी नही करते है .. अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हमें नहीं चाहिये, जब सारे त्याहोर भारतीय संस्कृति के रीती रिवाजों के अनुसार ही मानते हैं तो नया साल क्यों नहीं?

वंदेमातरम् ।

यह लेख नवनीत सिंघल जी के ब्लॉग से लिया गया है।

नया साल किसने बनाया और कैसे ? http://bharatsamachaar.blogspot.com/2014/12/blog-post_30.html

Sunday, October 25, 2015

सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का असर

सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का असर ---
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मित्रो दस साल पहले भारत से कई विश्व सुंदरियां बनी इसके पीछे विदेशी कंपनियों की सोची समझी साजिश थी .

- कई प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियां भारत में अपना मार्केट खोज रही थी . पर यहाँ अधिकतर महिलाएं ज़्यादा प्रसाधन का इस्तेमाल नहीं करती थी . इसलिए उन्होंने भारत से सुंदरियों को जीता कर लड़कियों के मन में ग्लेमर की चाह उत्पन्न की.
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मिसेज़ इंडिया जैसी प्रतियोगिताओं से बड़ी उम्र की महिलाओं को भी टारगेट किया गया .
- इन सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के बाद लडकियां सपने देखने लगी की वे भी मिस इंडिया , फिर मिस वर्ल्ड, फिर हीरोइन, फिर बहुत धनी बन सकती है .

- इसके लिए वे अपने आपको स्लिम करने के चक्कर में फिटनेस सेंटर में जाने लगी जहां क्रेश डाइटिंग , लाइपोसक्शन , गोलियां , प्लास्टिक सर्जरी जैसे महंगे और अनैसर्गिक तरीकेबताये जाते .

- सौन्दर्य प्रसाधन इस्तेमाल करना आम हो गया

.- ब्यूटी पार्लर जाना आम हो गया .

- इस तरह हर महिला सौन्दर्य प्रसाधनों , ब्यूटी पार्लर , फिटनेस सेंटर आदि पर हर महीने हज़ारो रुपये खर्च करने लगी .

- पर सबसे ज़्यादा बुरा असर उन महिलाओं पर पड़ा जोइन मोड़ेल्स की तरह दिखने के लिए अपनी भूख को मार कुपोषण का शिकार हो गई .

- इसलिए आज देश में दो तरह के कुपोषण है

- एक गरीबों का जो मुश्किल से एक वक्त की रोटी जुटा पाते है और दुसरा संपन्न वर्ग का जो जंक फ़ूड खाकर और डाइटिंग कर कुपोषण का शिकार हो रहाहै .

- यहाँ तक की नई नई माँ बनी हुई बहनों को भी वजन कम करने की चिंता सताने लगती है . जब की यह वो समय है जब वजन की चिंता न कर पोषक खाना खाने पर , आराम पर ध्यान देना कर माँ का हक है . ये समय ज़िन्दगी में एक या दो बार आता है और इस समय स्वास्थ्य की देख भाल आगे की पूरी ज़िन्दगी को प्रभावित करती है . यह समय मातृत्व का आनंद लेने का है ना की कोई नुमाइश की चीज़ बनाने का .

- ताज़ा उदाहरण है ऐश्वर्या राय . वह माँ बनाने की गरिमा और आनंद कोजी ही नहीं पाई . मीडिया ने उनके बढ़ते वजन पर ऐसे ताने कसे की वो अपने बच्ची की देखभाल और नए मातृत्व का आनंद लेना छोड़ वजन कम करने में जुट गई होंगी .

- अब जब इन कंपनियों का मार्केट भारत में स्थापित हो चुका है तो कोई विश्व सुंदरी भारत से नहीं बनेगी . अब इनकी दुसरे देशों पर नज़र है .! या कभी इनको लगे की मंदी आने लगी है तो दुबारा किसी को भारत मे से चुन ले !! क्यूंकि चीन के बाद भारत 121 करोड़ की आबादी वाला दुनिया का सबसे बढ़ा market है !!

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तो मित्रो ये सब कार्य बहुत ही गहरी साजिश बना कर अंजाम दिया जाता है ! जिसमे हमारा मीडिया विदेशी कंपनियो के साथ मिलकर बहुत  रोल अदा करता है !

मित्रो एक तरफ मीडिया देश मे बढ़ रहे बलात्कार पर छाती पीटता है ! और दूसरी तरफ खुद भी अश्लीलता को बढ़ावा देता है ! वो चाहे india today की मैगजीन के कवर हो ! या ये विदेशी  times of india अखबार ! ये times of india आप उठा लीजिये ! रोज times of india मे आपको पहले पेज पर या दूसरे पेज पर किसी ना किसी लड़की की आधे नंगी या लगभग पूरी नंगी तस्वीर मिलेगी ! जब की उसका खबर से कोई लेना देना नहीं ! जानबूझ कर आधी नंगी लड़कियों की तस्वीर छापना ही इनकी पत्रकारिता रह गया है !!

और ये ही times of india है जो भारत की संस्कृति का नाश करने पर तुला है !!
इसी ने आज से 10 -15 वर्ष पूर्व miss india, miss femina आदि शुरू किए ! जो अब मिस वर्ड ,मिस यूनिवर्स पता नहीं ना जाने क्या क्या बन गया है !!

आज हमने इनके खिलाफ आवाज नहीं उठाई ,इनका बहिष्कार नहीं ! तो कल ये हमारी बची कूची संस्कृति को भी निकग  जाएगा !!

MUST CLICK

LINK - https://www.youtube.com/watch?v=wI7foiSejO8

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Sunday, October 11, 2015

सरकारी शिक्षक की दुर्दशा

राजस्थान में  शिक्षा संबलन कार्यक्रम चल रहे है, अधिकारी अफसर स्कूल चेक कर रहे है और  रोज  अख़बारों में आ रहा है कि  फलाना स्कूल चेक हुआ और बच्चों से राजधानी पूछी, मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री का नाम पुछा और बच्चों को नही आया , इसी क्रम में आज एक खबर आई कि  किसी जगह  एक अफसर ने एक हिंदी शिक्षिका को black board  पर   अंत्येष्टि शब्द  गलत लिखते हुए देखा और उस अध्यापिका का  फोटो अख़बार में छाप दिया गया है l

अब विचारणीय प्रश्न ये है कि ऐसा करके समाज में, लोगों को, अभिभावकों को  क्या सूचना और संदेश दी जा रही है ? यही कि  सरकारी स्कूल के अध्यापकों को विषय का ज्ञान नही है ? उनको हिन्दी, अंग्रेजी,  गणित, आदि  नही आती ?

बड़ा विरोधाभास है…. एक तरफ सरकार कहती है कि सरकारी स्कूल में नामांकन बढ़े, ज्यादा बच्चे जुड़े, कोर्ट में केस दाखिल किये जा रहे है कि सरकारी स्कूल में अफसरों के बच्चे पढाई करें और दूसरी तरफ शिक्षकों की गरिमा और मर्यादा और उनके ज्ञान को धूमिल किया जा रहा है, ऐसी खबरे आने के बाद अभिभावक गण और समाज में ये सोच   पनपेगी कि   मास्टरों को कुछ नही आता, "मास्टर" यही शब्द अब संबोधन का जिन्दा रह गया है और गुरु जी जैसे लफ्ज गायब है l

एक सोचनीय तत्व ये है कि अफसर किस उद्देश्य से संबलन कार्यक्रम में निरीक्षण करने जाते है ? अपनी अफसरी दिखाने ? अध्यापकों को नीचा दिखाने ? उनको अपमानित करने ? अपना रौब दिखाने ? उनको फटकार लगाने ?

निंदनीय है ….  
नकारात्मक है ….
गलत है ….

होना तो ये चाहिए कि  अफसरों को शिक्षकों और बच्चों को प्रेरित करना चाहिए, उनका morale up करना चाहिए, उनको boost करना चाहिए, एक जोश  भरना चाहिए, कोई कमी दिखे भी तो शिक्षकों और बच्चों में सकारात्मक उर्जा भरनी चाहिए, अपमानित करने से तो शिक्षक निराश हो जायेगा,

अच्छा,  इन अफसरों के प्रश्न होते भी ऐसे है जो syllabus से बाहर के होते है, अफसरों का उद्देश्य सुधारवादी नही, आलोचक द्रष्टिकोण लिए होता है कि शिक्षक की गलती नजर आये बस, और हम अपना रौब दिखाए, 
एक अफसर ने लेफ्टिनेंट शब्द पुछा था शिक्षक से, क्योकि ये भी अप्रचलित शब्द है और लेफ्टिनेंट अंग्रेजी में lieutenant लिखा जाता है l

हिंदी में तो और भी कठिन शब्द है जो भ्रमित करते है, और किताबों में अख़बारों में गलत वर्तनी ही प्रचलित है जैसे उपरोक्त शब्द मिलता है सही शब्द उपर्युक्त की जगह, कितने लोग जानते है कि कैलाश शब्द गलत है और कैलास सही, दुरवस्था सही है दुरावस्था गलत, सुई नही सूई शब्द सही है, अध: पतन को अधोपतन लिखा जाता है ,  हिंदी भाषा की सही वर्तनी पूरे भारत में ही गिने चुने लोग सही लिख पायेगे, दो  aunthentic (प्रमाणिक) किताबो में एक में दोपहर सही शब्द माना है और एक ने दुपहर,  ,  भगवान जाने स्थाई शब्द सही है या स्थायी ?दवाई शब्द तो होता ही नही है,    सही शब्द या तो दवा है या दवाइयाँ, दुकानों पर लिखा मिष्ठान शब्द गलत है क्योकिं सही शब्द मिष्टान्न है, 

कोई भी व्यक्ति पूर्ण नही होता और कोई भी  शिक्षक सर्वज्ञ नही होता, चाहे कितना भी कोई स्वाध्याय कर लें,  शादी न करें, घर से कम निकलें , शादी विवाह मृत्यु  त्योहार आदि में जाना बन्द करके कोई टीचर सारी जिन्दगी पढ़ाई करें फिर भी किसी न किसी प्रश्न पर वो  अटक जायेगा क्योकि विषय और ज्ञान कोष अनन्त है

सरकारी स्कूल का अध्यापक कोई भी हो,  वो बुद्धिमान अवश्य होगा,  उसका कारण साफ़ है, वो 10 परीक्षाए पास करके शिक्षक बनता है, बीए, ऍम ए, pre बीएड, फिर b.ed, tet,  ctet, reet, फिर teacher के लिए प्रतियोगिता परीक्षा, सिर्फ क्रीम क्रीम प्रतियोगी ही अध्यापक बन पाते है,

कुछ हद तक  शिक्षक स्वाध्याय नही कर रहा,  जिसकी जिम्मेदारी  समाज और शिक्षा विभाग की है, आम इन्सान को नही पता कि सरकारी teacher के करियर में 40% field work है, 40% लिखा पढ़ी और सिर्फ20% अध्ययन अध्यापन है, field work मतलब शिक्षक गाँव में या शहर में घूमता है,  उसको स्कूल परिसर में बैठने का वक्त नही,  जनगणना,  pulse पोलियों, चुनाव, सर्वे, पोषाहार के लिए दाल सब्जी मिर्च मसाले लाना,  अभी चूल्हे cylinder लाने के लिए मशक्कत की,  और सबसे बड़ा कार्य b.l.o, गाँव में घुमते रहो,  फिर आये दिन ट्रेनिंग,  वाग पीठ, नामाकन के लिए द्वार द्वार घूमो, छात्रवृति वाले काम के लिए बच्चों और अभिभावकों से आय प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र की माथा पच्ची में पूरा जुलाई निकल जाता है और बोर्ड एग्जाम में सिर्फ govt टीचर की  ड्यूटी लगती है तो मार्च में सरकारी स्कूल खाली हो जाते है, वृक्षारोपण अभियान में पेड़ लेने भागो,   निश्शुल्क  पाठ्य पुस्तक लेने भागो, राशन कार्ड की ड्यूटी, रैलियां,  आये दिन बैंक का काम,    अध्यापक स्कूल में 2 मिनट चैन की सांस नही ले पाता है, मोटर साइकिल पर दे kick और भागों,   फिर कुछ जान बचती है तो लिखा पढ़ी का काम, 30  दिन में 60 डाके स्कूल से आती जाती रहती है,  अभी taf form भरे गये,  पूरा दिन form भरने में गया,  बच्चों की पढ़ाई गयी भाड़ में, रोजाना नई नई सूचनाये विभाग मांगता है और तरह तरह की u.c, किसी स्कूल में कमरा office निर्माण कार्य आ जाए तो समझों 6 महिने गये,  स्कूल में कोई पढाई नही होगी, कभी पोषाहार की डाक जाती है तो कभी छात्रवृति की,  कभी dise बुकलेट भरो तो अनीमिया गोलियों की डाक,  स्कूल आकर कोई आम इन्सान देखे तो पता चलेगा कि सरकारी स्कूल डाक खाना है, 

शिक्षक स्वाध्याय कैसे करे? क्यों करे ?   इस अजीबोगरीब माहौल में ? और पढ़ाई चाहिए भी किसको ?  हर कोई पास भर होना चाहता है,  डिग्री चाहता है,  ज्ञान किसको चाहिए ?  एक तरफ गुणवत्ता सुधारने के लिए    ncert  books लगा दी गयी और जिनका standard ऐसा है कि विज्ञानं की किताब पढाने के लिए lab की जरूरत है क्योकि सारे प्रयोग है,  सरकारी स्कूल में chalk dustar black बोर्ड की व्यवस्था तो होती नही सही से, बाकी lab की बात …. ? कक्षा कमरे है सही लेकिन एक में कबाड़ पड़ा है एक में चावल गेहूं है और एक में  पोषाहार पकाने के लिए लकड़ी भरी है और एक में ऑफिस अलमारी,  बच्चे फटी दरी लेकर पेड़ के नीचे बैठे रहते है, एक तरफ ncert books का आदर्शवाद और वही बोर्ड result सुधारने के लिए 20% संत्राक, 80 मे से 16 लाओ और 20 मे से 20…और  board result अच्छे की वाह वाही,

शिक्षा विभाग भी जादू का खेल है,  कभी क्या तो कभी क्या ? कभी एकीकरण,  कभी समानीकरण, कभी स्टाफिंग pattern,  शिक्षक को खुद नही पता कि उसका पत्ता  कब कट जाएगा ?    

शिक्षक भी इन्सान है, मीडिया भी बस आदर्शवाद का ढकोसला करता है,अंत्येष्टि गलत लिखा शिक्षिका ने तो उसका फोटो खींच दिया,  किसी बच्चे  ने चाहे खुद ही खुद को चोटिल कर दिया हो लेकिन बड़े बड़े अक्षरों में खबर छपेगी
"शिक्षक ने पीटा" 
"शिक्षक की करतूत,
कोई भी शिक्षक स्कूल में बैठकर time pass नही करता,  बच्चों को उनके माँ बाप  भी पिटाई करते है,  शिक्षक राक्षस नही है, अगर कोई एक शिक्षक गलती करता है तो पूरा शिक्षक समुदाय गलती सिद्ध नही हो जाता, पढ़ाई कोई घुट्टी नही है कि बच्चे का मुँह खोला और 2 बूँद डाल दी,  अनुशासन के लिए भय भी जरुरी होता है,  मीडिया को बहुत शौक है सच छपने का तो किसी सरकारी स्कूल में कुछ दिन काट कर आये,  देखे शिक्षक की दोहरी तिहरी जिम्मेदारी और माहौल, 

विश्व  का सारा ज्ञान और विकास शिक्षा  और शिक्षक के कारण ही वजूद में आया है, सरकारी शिक्षक बहुत ही निरीह है और आम इन्सान है, वो अपना 100% देना चाहता है, ये जरुर है कि वो दबावों में है, शिक्षण बस एक नौकरी भर नही है, अफसर मीडिया और समाज तीनों शिक्षक के प्रति अनुदार है और शिक्षक की गलत छवि पेश कर रहे है