Friday, August 5, 2016

यजन और भजन का अंतर समझ लीजिए


सीता राम चरन रति मोरे।
अनुदिन बढहिं अनुग्रह तोरे।।

रति काम से नहीं रति राम से चाहिये, श्री भरतजी भजन में डूबे हैं, हम सब यजन में रहते हैं, हम सब पाना चाहते हैं ये सब यजन हैं, जो हर परिस्थिति में संतुष्ट है वो भजन है, माँगने वाले को सदा शिकायत रहेगी कि मुझे कम दिया है, औरों को तूने इतना दे दिया, मुझे क्या दिया? माँगने वाला सदा प्रभु को दोष देता है।

भक्त हमेशा अनुग्रह में जीता है, अनुग्रह का अर्थ है प्रभु तूने इतना दिया है कि मैं तो इसे सम्भालने की क्षमता भी नहीं रखता, मेरी तो इतनी पात्रता भी नहीं है, ये भाव जहाँ से उठे उसे भजन कहते हैं, जो मिला है वो तो बहुत कम है मैरी पात्रता इससे बहुत ज्यादा है ऐसे भाव जहाँ से उठे उसको यजन कहते हैं, बुद्धि से पैदा हो वो यजन है।

जैसे मछली को पकड़ने के लिये जाल फेंका जाता है, भक्त का जाल उल्टा होता है, भक्त पुकारता है भगवन! तू कैसे ही मुझे अपने जाल में फँसा ले, अगर तू नहीं फँसायेगा तो मुझे ये माया का जाल फँसा लेगा, इसलिये जो फँसाती है वो बुद्धि है और जो फँसता है वो ह्रदय है, इसलिये भक्त भगवान से हमेशा ये ही कहते हैं!

अपने चरणों का दास बनाले, काली कमली के ओढन वाले।
गहरी नदिया नाव पुरानी, केवटिया या कौ नादानी।
मेरी नैया को पार लगा ले, काली कमली के ओढन वाले।
अपने चरणों का दास बनाले, काली कमली के ओढन वाले।।

अगर आप नहीं फँसाओगे तो माया मुझे फँसा लेगी, मुझे माया का दास नहीं बनना, भक्त दास बनता है परमात्मा का, इसलिये पंडित जन यजन करते हैं पर प्रेमी भजन करता है, ये जो यज्ञादि हो रहे हैं ये सब यजन हैं, ये यज्ञों अनुष्ठानों की निन्दा नहीं हैं, जो सूत्र है उस पर चर्चा कर रहे हैं।

प्रेम स्वयं करना पड़ता है जबकि अनुष्ठान यज्ञादि हमेशा किसी दूसरे से कराया जाता है, यजन दूसरे से और भजन स्वयं किया जाता है, प्रेम किसी दूसरे से कराओगे क्या? हम सिनेमाघर में दूसरे को प्रेम करते नाचते गाते देखते हैं, हम नाचें, हम गायें, हम प्रेम में डूबे, हम प्रेम में सराबोर हों ये भक्ति हैं, प्रेम ह्रदय से छलकता हैं।

पुजारी हमारे घर आकर घंटी बजाकर चला गया, उसकी ड्यूटी हो गयी, कल कोई दूसरा ज्यादा पैसा देगा तो वहाँ ड्यूटी करेगा, जिस दिन तनख्वाह नहीं दोगे उसी दिन पूजा बन्द कर देगा, उसे भी परमात्मा से कोई लेना देना नहीं है, हमको भी परमात्मा से कोई लेना देना नहीं है अन्यथा बीच में किसी को रखने की क्या आवश्यकता थी?

हमको नहीं आता विधि विधान मान लिया, हमें शास्त्र के नियम व्यवस्थायें नहीं आती मान लिया, आप प्रश्न करेंगे कि फिर करें क्या? अरे करना क्या है, परमात्मा के चरणों में बैठकर थोड़ी देर रो लेते, अपनी टूटी-फूटी भाषा में कुछ बात कर लेते, अपनी भाव भरी प्रार्थना खुद रच लेते, माँ गोद में बच्चे को खिलाती है वो कौन सा प्रशिक्षण लेकर आयी है कि बच्चे को कैसे खिलाया जाता है?

वो पागलों की तरह उससे घन्टों बतियाती रहती है, बालक न जानता है न सुनना जानता है, छाती से लगाये घंटो बातें करती है, ये ह्रदय की भाषा है, ये ह्रदय से जाकर टकराती है इसलिये हमें शास्त्र, मन्त्र, विधि-विधान नहीं आते तो ना आयें, हम ठाकुरजी के पास बैठकर उन्हें बता तो सकते हैं कि हमें कुछ आता नहीं।

केहि विधि अस्तुति करहुँ तुम्हारी।
अधम जाति मैं जडमति भारी।।
अथम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अधारी।।

दण्डकारण्य में शबरी अकेली थी क्या? कितने ऋषि-मुनि द्वार खड़े स्वस्तिक-वाचन का पाठ कर रहे थे, पुष्प हार लिये खड़े थे, भगवान ने किसी की ओर देखा तक नहीं, सीधे शबरी के आश्रम पग धरा, प्रभु विधि की ओर नहीं निधि की ओर आकर्षित होता है, शबरी को तो कोई विधि आती ही नहीं।

जैसे हमने सुना है कि बालक ने परमात्मा को क ख ग ही सुना दिया, कह दिया भगवन! मंत्र जैसा चाहो अपनी पसन्द का बना लेना, आप कृपया अपनी वर्णमाला तो सुनाइये परमात्मा को, और इसकी भी क्या आवश्यकता है? क्या भगवान हमारे भाव को समझता नहीं है।

"बैर भाव मोहि सुमिरहिं निसिचर" जब बैर भाव ऐसा हो सकता है तो प्रेम भाव कैसा होता होगा, आप कल्पना किजिये, हम मंदिर जाते हैं, क्या भाव है? कुछ माँगने जा रहे हैं तो यजन है, चढाने जा रहे है तो भजन हैं, लेकिन चार सेब चढाकर चालीस गुना प्रभु से माँगने जा रहे हैं।

ह्रदय में भीतर सूची भरी हुई है कि ये माँगना है वो माँगना है जहाँ से हम लेने जाते है वो दुकान है और जहाँ हम देने जाते है वो मंदिर हैं इसलिये भगवत प्रेम के बिना जितने भी अनुष्ठान हैं वो सब यजन हैं।

शेष जारी ••••••••••••

जय श्री रामजी
शुभ रात्रि
मोतीभाई रावल

100 करोड़ में से कितने हैं सच्चे भारतीय

विडंबना लगती है जब कुछ लोग कहते हैं कि हम 100 करोड़ हिन्दू हैं या 100 करोड़ भारतीय हैं, हम 100 करोड़ हिन्दू मिल जाएं तो क्या नही कर सकते??

यदि आकलन करो कि यह 100 करोड़ कौन हैं तो लज्जा आ जाती है सोचकर... ।

100 करोड़ हिन्दू ?

100 करोड़ भारतीय?

कौन से 100 करोड़?

वो जो प्लासी की लड़ाई में अंग्रेजों की और से लड़ रहे थे?

वो जो बक्सर की लड़ाई में अंग्रेजों की और से लड़ रहे थे?

वो जो प्लासी की लड़ाई के बाद हो रही आतिशबाजी में नाच रहे थे?

वो जो 1857 के संग्राम में भी अंग्रेजों की और से लड़ रहे थे?

वो जो 1860 के बाद अंग्रेजों की आईएएस, आईपीएस, आदि नौकरियाँ पाने के लिए विदेशी कल्चर को अपनाने में सबसे आगे दौड़ने लगे थे?

वो जो अंग्रेजों के यहाँ क्लर्क थे?

वो जो चापलूसी कर कर के अंग्रेजों के राय बहादुर, दीवान, जागीरदार बनते थे?

वो जो जज, मजिस्ट्रेट बनते थे?

वो जो पुलिस अधिकारी बनते थे, हवलदार बनते थे?

वो भारतीय .. या वो हिन्दू जिनकी एक गोली शायद चन्द्रशेखर आज़ाद के शरीर को लहू लुहान कर गई होगी?

वो भारतीय जो क्रांतिकारियों की मुखबिरी करते थे?

चलो
कामनवेल्थ वाली झूठी आज़ादी की बात करते हैं।

वो भारतीय जिन्होंने स्वत: अपने बच्चों को गुरुकुल भेजकर स्वावलंबी बनाने के स्थान पर सरकारी और कान्वेंट स्कूलों में भेजना आरंभ किया ...नौकरी की मानसिकता से?

वो भारतीय या वो हिन्दू जिसने शिखा, जनेऊ, तिलक का स्वयं परित्याग किया ...न् जाने कितने औरँगज़ेब उनके इर्द गिर्द घूम रहे होंगे?

वो भारतीय जो अपने बच्चों को बचपन में जब स्कूल भेजता है तो ...लायक स्वावलम्बी नही अपितु नालायक देशद्रोही बनाने हेतु भेजता है जिससे कि वो कामनवेल्थ सिस्टम को चलाने में सहयोगी बन सके?

वो भारतीय जो आज भाषा, प्रान्त, आरक्षण के नाम पर एक अन्य भारतीय को जान से मारने से भी पीछे नही हटता?

वो भारतीय जो आज भारत पाकिस्तान मैच में गालों पर तिरंगा लगा कर अपने राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करता है?

वो भारतीय जिसका देशप्रेम केवल तभी उमड़ता है जब सीमा पर 2 जवानों के सर काट दिए जाते हैं?

वो भारतीय जो अंधभक्ति में हर हर महादेव के स्थान पर हर हर मोदी के नारे लगाने लगते हैं?

वो भारतीय जो आज भी भारत में शिक्षा दीक्षा पाकर विदेशी नौकरियों के पीछे भाग रहे हैं?

वो भारतीय जो आज वर्दी पहन कर गौरक्षकों पर लाठियां बरसाते हैं?

वो भारतीय जो आज वन्दे मातरम कहने वालों पर ही लाठियां बरसाते हैं?

वो भारतीय जो सर्वधर्म समभाव की आड़ में अधर्म को भी धर्म समझे बैठे हैं?

वो भारतीय जो आज अपने पूर्वजों की महान विरासत, संस्कृति को बोझ समझते हैं और जिन्हें देखना कोई गर्व नही अपितु मात्र पिकनिक का विकल्प है?

*वो हिन्दू जो आज राजनीतिक पार्टी की आन, बान और शान को ही धर्म की बपौती समझे बैठा है?*

वो हिन्दू को आज साईं बाबाओं, निर्मल बाबाओं, महरौली वाले गंजे गुरूजी को पूज रहे हैं और पूछते हैं ... *शंकराचार्य कौन हैं?*

वो हिन्दू जो आज मात्र गले में कंठी टाँगे हरि भजन को ही अपना सर्वस्व कर्म समझे बैठा है?

वो हिन्दू आज हिन्दू को ही मूर्ति पूजा और पुराणों में श्रद्धा के कारण उनको गरिया रहा है?

वो हिन्दू जो आज पंथ, सम्प्रदायों में मस्त हो customize & convinient hinduism की और बढ़ रहा है?

वो हिन्दू जो आज मांस, मदिरा और मैथुन को ही जीवन का उद्देश्य समझे बैठा है?

वो हिन्दू जो आज सुबह ऑफिस जल्दी पहुँचने हेतु पूजा तो छोड़ सकता है... परन्तु शाम को दरगाह, मजार पर फूल चढ़ाना नही भूलता?

वो हिन्दू... जो आज रोमांटिक गानों में एकदम उदासीन जीवन जीने और girl friend की चाह में जिंदगी को झंड बनाने पर तुला है?

*वो हिन्दू ...जिसकी आधी पेंट उसके पिछवाड़े के नीचे लटक रही होती है?*

वो भारतीय जो आज अपनी देववाणी संस्कृत या हिंदी के शुद्ध उच्चारण पर उपहास स्वरूप हंसते हैं?

*वो भारतीय जो आज भी 26 जनवरी और 15 अगस्त मनाते हैं? और कामनवेल्थ की गुलामी का आनन्द उठाते हैं?*

*वो भारतीय जो आज गर्व से कहते हैं I PROUD TO BE AN INDIAN*

निर्णय कीजिये अब आप...
यही भारतीय बचाएंगे देश...

100 करोड़ में से कितने हैं ऋषि भूमि के वास्तविक वंशज जो गर्व करते हैं स्वयं पर जो कह सकते हैं कि उपरोक्त किसी भी श्रेणी में उनका नाम कहीं सूचीबद्ध नही।

(विचार अवश्य करे आप इन में से कहाँ है)

जय श्रीराम कृष्ण परशुराम

हर हर महादेव
(Copied)

Friday, April 15, 2016

गांधी का स्त्रैण दर्शन - रजनीश ओशो

आइये जानें की गाँधी के बारे में ओशो के क्या विचार थे।

"उस आदमी के हाथ में कुछ भी नहीं था - लेकिन सिर्फ उपवास से ......... उसने एक स्रैण चाल सीखी है। हाँ, मैं उसके पूरे दर्शन को स्रैण दर्शन कहता हूँ । "
महिलाएं ये काम हर दिन करती हैं । निश्चित ही गांधी ने इसे अपनी पत्नी से सीखा होगा । भारत में महिलाएं हर दिन ये काम करती हैं । पत्नी उपवास पर चली जाती है , वो खाना नहीं खाती है , जमीन पर पड़ जाती है । और ये सब देख कर आदमी कांपना शुरू हो जाता है। वो सही भी हो सकती हैं , लेकिन मुद्दा ये नहीं है.
अब सही है या गलत का कोई मतलब नहीं है; अब बात खाने के लिए उसे राजी करने के लिए है? वह नहीं खा रही है बच्चे भी नहीं खा रहे हैं – सबसे महत्वपूर्ण कि वो खाना भी नहीं पका रही है ? आदमी भी भूखा है ? और बच्चे रो रहे हैं, और वे खाना चाहते हैं, और पत्नी एक उपवास पर है - तो सही गलत का मुद्दा मायने नहीं रखता, - बस आप सहमत हैं।
पत्नी को नई साड़ी की जरूरत है, तो आप पहले उसे ला कर देते हैं तब वो रसोई में जाती है, यह भारत में सभी महिलाओं की एक पुरानी भारतीय रणनीति है।
गांधी ने अपनी पत्नी से यह सीखा है, और वह यह वास्तव में बहुत चालाकी से कर रहा है, .असल में ये आदमी खुद को यातना देने में सक्षम है और ये मानव मन का एक बेहद आश्चर्यजनक पहलु है कि वो ऐसे लोगों से प्रभावित होता है जो स्वम को कष्ट पहुचने में सक्ष्छ्म हो."

ओशो ( रजनीश )
From Personality to Individuality
Translate and re-posted by
*रानी चौधरी *

http://ranichoudhary.blogspot.in/2015/06/blog-post_14.html?m=1

Wednesday, March 30, 2016

वेदों की अवहेलना भारी पड़ी हमें

क्या आप जानते है भारत की दुर्गति के पीछे वेद की आज्ञाओ का उलंघन ही था ?

1.) पहली आज्ञा

अक्षैर्मा दिव्य: ( ऋ 10/34/13 )
अर्थात जुआ मत खेलो ।

इस आज्ञा का उलंघन हुआ । इस आज्ञा का उलंघन धर्म राज कहेजाने वाले युधिष्टर ने किया ।

परिणाम :- एक स्त्री का भरी सभा में अपमान । महाभारत जैसा भयंकर युद्ध जिसमे करोड़ो सेना मारी गयी । लाखो योद्धा मारे गये । हजारो विद्वान मारे गये और आर्यावर्त पतन की ओर अग्रसर हुआ ।

2.) दूसरी आज्ञा

मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः । ( ऋ 8/48/14)

अर्थात आलस्य प्रमाद और बकवास हम पर शासन न करे ।

लेकिन इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । महाभारत के कुछ समय बाद भारत के राजा आलस्य प्रमाद में डूब गये ।

परिणाम :- विदेशियों के आक्रमण
3.) तीसरी आज्ञा

सं गच्छध्वं सं वद्ध्वम । ( ऋ 10/191/2 )

अर्थात मिल कर चलो और मिलकर बोलो ।

वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब विदेशियों के आक्रमण हुए तो देश के राजा मिल कर नहीं चले । बल्कि कुछ ने आक्रमणकारियो का ही सहयोग किया ।

परिणाम :- लाखो लोगो का कत्ल , लाखो स्त्रियों के साथ दुराचार , अपार धन धान्य की लूटपाट , गुलामी ।

4.) चौथी आज्ञा

कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः । ( अथर्व 7/50/8 )

अर्थात मेरे दाए हाथ में कर्म है और बाएं हाथ में विजय ।

वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ । लोगो ने कर्म को छोड़ कर ग्रहों फलित ज्योतिष आदि पर आश्रय पाया ।

परिणाम : अकर्मण्यता  , भाग्य के भरोसे रह आक्रान्ताओ को मुह तोड़ जवाब न देना
, धन धान्य का व्यय , मनोबल की कमी और मानसिक दरिद्रता ।

5.) पांचवी आज्ञा

उतिष्ठत सं नह्यध्वमुदारा: केतुभिः सह ।
सर्पा इतरजना रक्षांस्य मित्राननु धावत ।। ( अथर्व 11/10/1)

अर्थात हे वीर योद्धाओ ! आप अपने झंडे को लेकर उठ खड़े होवो और कमर कसकर तैयार हो जाओ । हे सर्प के समान क्रुद्ध रक्षाकारी विशिष्ट पुरुषो ! अपने शत्रुओ पर धावा बोल दो ।

वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ जब लोगो के बिच बुद्ध ओर जैन मत के मिथ्या अहिंसावाद का प्रचार हुआ । लोग आक्रमणकरियो को मुह तोड़ जवाब देने की वजाय “ मन्युरसि मन्युं मयि धेहि “ यजु 19.9 को भूल कर मिथ्या  अहिंसावाद को मुख्य मानने लगे ।

परिणाम :- अशोक जैसा महान योद्धा का युद्ध न लड़ना । विदेशियों के द्वारा इसका फायदा उठा कर भारत पर आक्रमण करना आरम्भ हुवा ।

6.) छठी आज्ञा

मिथो विघ्राना उप यन्तु मृत्युम । ( अथर्व 6/32/3 )

अर्थात परस्पर लड़नेवाले मृत्यु का ग्रास बनते है और नष्ट भ्रष्ट हो जाते है ।

वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ ।

परिणाम - भारत के योद्धा आपस में ही लड़ लड़ कर मर गये और विदेशियों ने इसका फायदा उठाया ।

Sunday, January 31, 2016

ये विकास है या विनाश

लेख लम्बा जरूर है पर जन जागृति के लिए अत्यंत आवश्यक है, निवेदन है एक बार समय निकाल कर पढ़ें और यदि ठीक लगे तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएं...

क्या खाओगे रोटी या कंप्यूटर ?
खाने के लिए रोटी की ज़रूरत होती है कंप्यूटर की नहीं??
आप लोग सोच रहे हैं ये क्या पागलपन की बात लिखी है कोई कंप्यूटर कब खाता या खिलाता है !
इसे आगे पढिये आप खुद जान जायेंगे क्या हो रहा है इस देश में ! जैंसा की हम सभी जानते हैं के हमारा देश हमेशा से कृषि प्रधान रहा है और हमारी देश का आधे से ज्यादा धन या अर्थव्यवस्था कृषि से ही आती है ! पर आज हमें खाने की चीज़े महंगे दामो पर मिल रही है ! लगभग हर फल या सब्जी में मिलावट है यहाँ तक के गाए के दूध तक में मिलावट ! जो फल या सबजिया पहले कभी हम मुफ्त में बाट दिया करते थे आज खरीद कर नहीं मिल रही क्यों ??????
इसका कारण जानना चाहते हैं :- ये एक बहुत बड़ा मुद्दा और समस्या है जिसे आज में उठा रहा हूँ , इसलिए ध्यान से पढियेगा इसे क्योंकि अगर आज इस चीज़ पर देश में ध्यान नहीं दिया गया तो हमारा सारा देश साथ ही कई पडोसी देश भी, जो एसा कर रहे हैं, भूखे मर जायेंगे |
ये सब किसी पार्टी के कारण नहीं हमारी सोच के कारण हो रहा है ! हम देश की तरक्की के नाम पर अपना ही नुकसान कर रहे हैं और ये ऐसे हो रहा है, के ये सारे बड़े बिल्डर्स ने अपना काम शहरों में पूरा कर लिया अब उनका धंधा शहर में खत्म होने लगा , तो उन्होंने गाँव का रुख किया है | आज सारे बड़े शहर चाहे वो मुंबई, पुणे हो या बंगलोर और दिल्ली सब आस पास के छोटे छोटे गाँव से मिलकर बने हैं, और सारे गाँव में किसानो की जमीनों को बिल्डर्स ने लालच देकर या डरा धमकाकर खरीद लिया और नेताओं ने भी तरक्की और विकास के नाम पर खेतो को ख़त्म करके वह बिल्डिंग्स बनाने दी और धीरे धीरे भारत के खेत ख़त्म होने लगे न ही सिर्फ खेत साथ ही किसान भी क्योंकि .....
हमारी गन्दी सोच है के जो सूट पहना है या tie लगाया है वो महान है और ज्ञानवान है और धोती पहनने वाले लोग मुर्ख है बस इसी सोच के कारण आज किसान अपने बेटों को किसान नहीं बना रहे बल्कि इंजीनियर या डोक्टर बना रहे हैं और वो सभी बाद मे बेरोजगार घूमते हैं ???
हर किसान आज शहर जाके कंप्यूटर और लैपटॉप और सूट लेना चाहता है और खेत में काम नहीं करना चाहता क्योंकि हम उसे वह सम्मान नहीं देते!
एक गरीब किसान जो अपने दिन रात एक करके हमारे लिए फसल उगाता है अनाज उगाता है, हम उसे इज्ज़त नहीं देते यहाँ तक के बस या ट्रेन में अपने पास तक नहीं बैठने देते और कोई कंप्यूटर इंजिनियर या सूट पहना MBA हो जो कंप्यूटर या लैपटॉप लिया हो ,उसके पास सब बैठते और चाहे वो कितना भी गधा हो उसकी इज्ज़त हैं | जबकि वह या तो आपको ख़राब सामान बेचकर जा रहा है या विदेशी कंपनी को भारत का धन लूट कर भेज रहा है, तब भी किसान से ज्यादा इज्ज़त उसे देंगे क्योंकि वह अंग्रेजो वाले कपडे पहनता है ना ??????
वाह शर्म आनी चाहिए हमे अपने आप पर .......
क्या सिर्फ सूट पहनने या शहर में रहने से ही ज्ञान आता है , अरे हमारे देश में तो 'सादा जीवन उच्च विचार' की संस्कृति है , और लाखों वर्षो से यहाँ के साधू-संत जंगलों में ज्ञान प्राप्त करते आये है, किसी विदेशी स्कूल में या शहर में नहीं , बल्कि उन महान ऋषियों ने हमेशा इन बेवकूफ शहर वालों को ज्ञान दिया है , आज हम जिस अमेरिका का अनुसरण कर रहे हैं वहां आज भी विवेकानंदा के और महिर्षि योगी या ओशो या बाबा रामदेव के कई चेले हैं, किसी भारतीय mba के नहीं क्यों????
क्योंकि ज्ञान सिर्फ computer चलाना और अंग्रेजी आना नहीं होता , और अगर इन पड़े लिखे लोगो को इनकी पढाई का ज्ञान है तो किसानो को भी धर्म का इंसानियत का फसल कब उगानी है कब लगानी है इन सबका ज्ञान है , आयर्वेद का ज्ञान हे , प्रकर्ति का ज्ञान हे !!!
पर आज विकास की इस अंधी दौड़ में हम खेती की जमीनों पर कब्ज़ा करकर शोपिंग मोल और बिल्डिंग बना रहे हैं , जिससे एक दिन सभी किसान ख़त्म हो जायेंगे ?????????
इसीलिए मैंने कहा था जब किसान ख़त्म हो जायेंगे तो रोटी और अन्न ख़त्म हो जायेगा और तब खाना लैपटॉप और कंप्यूटर !
और तब लैपटॉप आएंगे २ रुपये में और रोटी १ लाख में क्योंकि laptop के बिना इन्सान जी सकता है पर रोटी के बिना नहीं| आज जनसँख्या इतनी बढ गई है के किसान को बढ़ावा मिलना चाहिए और खाने की वस्तुओं का उत्पादन और बढना चाहिए बल्कि हो उल्टा रहा है ! किसान कम हो रहे हैं वाह क्या विकास हो रहा है !
कुछ समय पहले की बात है गुडगाँव के सारे किसानो ने जमीने बिल्डर्स को बेच दी और dlf और कई बड़ी कंपनियों ने वहां बिल्डिंगे बना दी अब वो बेचारे नासमझ किसान जो अनपड़ हे , जब तक पैसा खर्च नहीं होता तब तक ऐश से रहेंगे बाद में भूखे मरेंगे और बिल्डर्स ने तो अपना काम निकाल लिया ,लेकिन उस हरयाणा की ज़मीन पर या नॉएडा के पास उत्तर प्रदेश की ज़मीन पर ,या महाराष्ट्र में मुंबई और पुणे के किसानो की ज़मीन पर जो खेत थे जो अन्न उगता था , सब ख़त्म, लाखो लोगो को जहा से अनाज मिल सकता था आज सब ख़त्म,........ अब खाओ शौपिंग माल और इंजीनियरिंग कालेज ??
और सबसे ज्यादा डर की बात अब यही हे के अब यही सब छोटे प्रदेशों में भी होने लगा है मध्य प्रदेश में हो रहा है आज, भोपाल और इंदौर के पास की सारी ज़मीने बिल्डर्स ने खरीद ली और यहाँ इंजीनियरिंग कॉलेज बना रहे है या कॉलोनियां बसा रहे हैं इसी तरह चलता रहा तो एक दिन सारे किसान मरेंगे फिर उनके बच्चे मरेंगे और फिर वो लोग जिन्हें खाने नहीं मिलेगा , और फिर ..............हम सब !
ये बिल्डर्स और नेता तो करोरो रुपये लेकर निकल जायेंगे यहाँ से विदेश पर हम सबका क्या होगा?? क्या होगा इस देश की १०० करोड़ से ज्यादा जनता का ये हमें सोचना है !!!!
और यही मेरी चिंता का विषय है..................
हमे किसानो को रोकना होगा ज़मीने बेचने से उन्हें उनकी खोई इज्ज़त वापस दिलाना होगी, जिस तरह लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था जय जवान जय किसान, वैसे ही और किसानो को समझाना होगा, अपने बच्चो को किसान ही बनाये उन्हें सारी चीज़े हम गाँव में ही मुहैया करवाएंगे और उन्हें पढ़ाएंगे भी और इज्ज़त भी देंगे और इन धोखेबाज़ और खुनी बिल्डर्स को रोकना होगा वरना ताकत और पैसे के नशे में चूर ये सारे देश को या तो विदेशियों के हाथों में बेच देंगे या बर्बाद कर देंगे और बना देंगे किसानो की लाशों पर बड़ी बड़ी इमारते !!
खेत और हरियाली ख़त्म होने से कई संकट है :-
1)हम और हमारे किसान भूखे मरेंगे |
2) global warming बढ़ेगी, पर्यावरण का नाश हो जायेगा |
3) हमारी अर्थ व्यवस्था डूब जाएगी क्योंकि खेती पर निर्भर है |
4)और हमे विदेशों से खाने की वस्तुए मंगनी होगी सोचो जब वो लोग पेट्रोल और डीसल जिसके बिना हम जीवित रह सकते हैं इतना महंगा देते हैं हमे क्योंकि वो हमारे पास नहीं है और उनके पास है तो .......
हमे खाना कितना महंगा देंगे ......सारे गरीब मर जायेंगे भुखमरी बढेगी
और जो अमेरिका हमें जंग के समय हथियार देने पर या पैसा उधार देने पर इतनी शर्ते लगा देता है सोचो जब खाना मांगना पड़ गया तब कैसी शर्ते माननी पड़ेगी ....
यदि वो बोले गुलाम बन जाओ तो ....................शायद
इसे रोकना होगा ..........हम लोग इस दिशा में जनजाग्रति का कार्य कर रहे हैं , आप भी सहयोग करे और भारत के हर जिले में किसानो को समझाए और लोगो को क्योंकि अकेला किसान इन बड़े बिल्डर्स और कॉर्पोरेट घरानों से नहीं लड़ सकता जनता को उनका साथ देना होगा और रोकना होगा हमें अपने भ्रष्ट नेताओं को जो किसानो की या सरकारी जमीनों का सौदा चंद रुपये खा कर कर देते है ?????????????
जब भी आपके शहर में नयी कालोनी बन रही हो या शहर के बाहर कुछ कालेज या शौपिंग माल बन रहा हो !!!!!! तो एक बार सोचियेगा जरुर के ये विकास हो रहा है या विनाश हमेशा ये याद रखे "खाने के लिए रोटी की ज़रुरत होती है कंप्यूटर या लैपटॉप की नहीं"
और खेती के लिए जमीन की ज़रूरत होती हे शोपिंग माल की नहीं।
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