Wednesday, August 16, 2017

क्या हम आज़ाद हैं

स्वतंत्र -
स्व मतलब अपना
तंत्र मतलब व्यवस्था

क्या देश मे हमारा अपना तंत्र है, अपनी व्यवस्था है?
क्या कानून हमारे अपने हैं, क्या संविधान हमारा अपना है, क्या शासन व्यवस्था अपनी है, क्या न्याय व्यवस्था अपनी है?
हमारे ज्यादातर कानून अंग्रेजों के बनाए हुए हैं..
आइए एक नज़र डालें 👇

*Indian Police Act 1861
(1857 जैसा विद्रोह फिर से ना हो, उसे कुचलने के लिए indian police act बनाया gya)

*Indian Penal Code 1860
*The Indian income tax Act 1860
(The Indian Income Tax Act of 1860 was enforced to meet the losses sustained by the government on account of the military mutiny of 1857.)

*Government of India Act 1935
(भारत के संविधान का अधिकतर हिस्सा Government of India Act 1935 से हो लिया gya है)

Indian trusts Act 1882
Land acquisition Act 1894
Sale of goods Act 1930
Transfer of Property Act 1882
Weekly Holidays Act 1942
Registration Act 1908
Indian Stamp Act 1899
Employer's Liability Act 1938
Employees compensation Act 1923
Religious Endowments Act 1863
Waste Lands (claim) Act 1863
Indian Tolls Act 1851
Power of Attorney Act 1882
Indian forest Act 1927
Central excise 1944

*Indian Arms Act 1878
(भारतीयों से हथियार रखने का अधिकार छीन लिया गया, इसी का नया रूप है Arms Act 1959)

अब जरा सोचिए कि हम कितने आज़ाद हैं.!!

Monday, June 5, 2017

गाँव vs शहर

*गांव vs शहर*
बड़ा घर आंगन वाला
छोटा फ्लैट जिसमे छत भी अपनी नही

बड़ा दिल सबसे मिल जुलकर रहना
Ego इतनी की पड़ोसी तक से जलन ईर्ष्या व बैर

स्वच्छ जल वायु भोजन (नजदीक के खेतों से या घर की बागवानी से)
जहरीले रसायनिक जल वायु व भोजन (दृर के गांवों से, महंगे दामो पर)

बड़ा परिवार मिल जुलकर रहते
छोटे nuclear फैमिली लड़ झगड़ कर रहते

जल्दी उठना जल्दी सोना सैर करना स्वस्थ रहना
देर से सोना देर से उठना, आलस में पड़े रहना व गोली खाकर जीते रहना

न मिला *स्वास्थ्य* शहर में उल्टा बिगड़ गया
न मिला सुख शांति *समृद्धि* बल्कि दुख stress ने घेर लिया
न मिला अपनो का प्रेम, *रिश्ते* भी टूटने लगे
समाज मे गांव में तो *इज्जत* भी थी, भागीदारी भी थी यहां तो सब मुंह पर कुछ और और पीठ पीछे कुछ और ही कहते हैं ।

*आखिर क्या है इस शहर में जो हर कोई गांव छोड़कर इधर चला आया*

जीवन के 4 उदेशय और 4 के 4 ही शहर में विफल। तो क्या गांव जीवन और शहर मृत्यु है ?

*गांव में जो कमियां थीं क्या वह दृर नही हो सकती ? हाँ सरल है ।*

*शहर में जो कमियां हैं क्या वह दृर हो सकती हैं ? नही बहुत कठिन है ।*
-नवनीत सिंघल

क्या आप भी बड़े वाले हैं???

*आज के पढ़े लिखे महान लोगों की सोच व समझ का दर्पण*

पढाई अच्छी हो या न हो स्कूल बड़ा होना चाहिए,

रिश्ता ठीक से निभे न निभे लेकिन उपहार बड़ा होना चाहिए,

चाहे कर्ज लेना पड़े पर घर, गाड़ी सब बड़ा होना चाहिए,

खाना ठीक हो या न हो लेकिन रेस्टोरेंट बड़ा होना चाहिए.

विवाह संस्कार ठीक से हो न हों पर शादी में टेंट और बजट बड़ा होना चाहिए.

खेती की जमीन हो या न हो लेकिन बड़े शहर में घर होना चाहिए ।

*छोटे गांव के बड़े घर को छोड़कर बड़े शहर के छोटे घर मे खुशी से रहते हैं क्योंकि बड़े लोग हैं न भाई*

और इन सबको बड़ा करने के चक्कर में जिन्दगी, ख़ुशी कहीं छोटे से कोने में दुबकी रहती है जो बाद या तो अस्पताल में बड़ी दिखती है या शमशान में .....

क्या आप भी बड़े वाले हैं ❓❓
Via- नवनीत सिंघल

भगतसिंह की फाँसी और गाँधी

किताबों को खंगालने से हमें यह पता चला कि ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय‘ के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय जी नें 14 फ़रवरी 1931 को लार्ड इरविन के सामने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी रोकने के लिए मर्सी पिटीसन दायर की थी ताकि उन्हें फांसी न दी जाये और कुछ सजा भी कम की जाएl लार्ड इरविन ने तब मालवीय जी से कहा कि आप कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष है इसलिए आपको इस पिटीसन के साथ नेहरु, गाँधी और कांग्रेस के कम से कम 20 अन्य सदस्यों के पत्र भी लाने होंगेl
जब मालवीय जी ने भगत सिंह की फांसी रुकवाने के बारे में नेहरु और गाँधी से बात की तो उन्होंने इस बात पर चुप्पी साध ली और अपनी सहमति नहीं दीl इसके अतिरिक्त गाँधी और नेहरु की असहमति के कारण ही कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी अपनी सहमति नहीं दीl रिटायर होने के बाद लार्ड इरविन ने स्वयं लन्दन में कहा था कि ”यदि नेहरु और गाँधी एक बार भी भगत सिंह की फांसी रुकवाने की अपील करते तो हम निश्चित ही उनकी फांसी रद्द कर देते, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे ऐसा महसूस हुआ कि गाँधी और नेहरु को इस बात की हमसे भी ज्यादा जल्दी थी कि भगत सिंह को फांसी दी जाएl”
प्रोफ़ेसर कपिल कुमार की किताब के अनुसार ”गाँधी और लार्ड इरविन के बीच जब समझौता हुआ उस समय इरविन इतना आश्चर्य में था कि गाँधी और नेहरु में से किसी ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को छोड़ने के बारे में चर्चा तक नहीं कीl” इरविन ने अपने दोस्तों से कहा कि ‘हम यह मानकर चल रहे थे कि गाँधी और नेहरु भगत सिंह की रिहाई के लिए अड़ जायेंगे और हम उनकी यह बात मान लेंगेl
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी लगाने की इतनी जल्दी तो अंग्रेजों को भी नही थी जितनी कि गाँधी और नेहरु को थी क्योंकि भगत सिंह तेजी से भारत के लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे थे जो कि गाँधी और नेहरु को बिलकुल रास नहीं आ रहा थाl यही कारण था कि वो चाहते थे कि जल्द से जल्द भगत सिंह को फांसी दे दी जाये, यह बात स्वयं इरविन ने कही हैl इसके अतिरिक्त लाहौर जेल के जेलर ने स्वयं गाँधी को पत्र लिखकर पूछा था कि ‘इन लड़कों को फांसी देने से देश का माहौल तो नहीं बिगड़ेगा?‘ तब गाँधी ने उस पत्र का लिखित जवाब दिया था कि ‘आप अपना काम करें कुछ नहीं होगाl’ इस सब के बाद भी यादि कोई कांग्रेस को देशभक्त कहे तो निश्चित ही हमें उसपर गुस्सा भी आएगा और उसकी बुद्धिमत्ता पर रहम भी l

लाचार फौजी

(एक माँ कश्मीर मे पिटने वाले फौजी बेटे से)

फोन किया माँ ने बेटे को........तूने नाक कटाई है,
तेरी बहना से सब कहते .........बुजदिल तेरा भाई है!

ऐसी भी क्या मजबुरी थी........ऐसी क्या लाचारी थी,
कुछ कुत्तो की टोली कैसे........तुम शेरो पर भारी थी!
वीर शिवा के वंशज थे तुम......चाट क्यु ऐसे धुल गए,
हाथो मे हथियार तो थे.......क्यु उन्हें चलाना भूल गये!
गीदड़ बेटा पैदा कर के............मैने कोख लजाई है,
तेरी बहना से सब कहते .........बुजदिल तेरा भाई है!!
      
              (लाचार फौजी अपनी माँ से)

इतना भी कमजोर नही था.......माँ मेरी मजबुरी थी,
उपर से फरमान यही था.......चुप्पी बहुत जरूरी थी!
सरकारे ही पिटवाती है..........हमको इन गद्दारो से,
गोली का आदेश नही है.......दिल्ली के दरबारो से!
गिन-गिनकर मैं बदले लूँगा.....कसम ये मैंने खाई है,
तू गुड़िया से कह देना .... ना बुजदिल तेरा भाई है!!👇🏿